
धरा की गोद में बिछी,
हरियाली की है चादर
नीले नभ के दर्पण में,
बादलों का है आदर ।
झरनों का वो कल-कल
स्वर, संगीत सा है बुनता ,
पर्वत की उन चोटियों पर,
मौन भी कुछ है सुनता ।
सुबह की पहली
किरण जब, ओस को
छू कर जाती
मुरझाए हुए पत्तों में भी,
जान है भर जाती ।
फूलों की कोमल पंखुड़ी,
कोई बात है कहती ,
प्रकृति के इस आंचल में ही,
मेरी रूह है रहती ।
न ऋतुओं का कोई आग्रह,
न मौसम का कोई बंधन,
परिवर्तन की लय में देखो,
कैसा दिव्य सृजन।
वृक्षों की हिलती डाली में,
ईश्वर का ही है डेरा ,
प्रकृति के हर एक कण में,
बस उसका ही है बसेरा ।
सुंदरता कोई वस्तु नहीं,
यह दृष्टि का ही है विस्तार
जहाँ प्रेम है, वहीं सृष्टि का, असली है श्रृंगार ।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




