साहित्य

प्रकृति: एक सजीव स्पंदन

डॉ. दक्षा जोशी'निर्झरा

धरा की गोद में बिछी,

हरियाली की है चादर

नीले नभ के दर्पण में,

बादलों का है आदर ।

 

झरनों का वो कल-कल

स्वर, संगीत सा है बुनता ,

पर्वत की उन चोटियों पर,

मौन भी कुछ है सुनता ।

 

सुबह की पहली

किरण जब, ओस को

छू कर जाती

मुरझाए हुए पत्तों में भी,

जान है भर जाती ।

 

फूलों की कोमल पंखुड़ी,

कोई बात है कहती ,

प्रकृति के इस आंचल में ही,

मेरी रूह है रहती ।

 

न ऋतुओं का कोई आग्रह,

न मौसम का कोई बंधन,

परिवर्तन की लय में देखो,

कैसा दिव्य सृजन।

 

वृक्षों की हिलती डाली में,

ईश्वर का ही है डेरा ,

प्रकृति के हर एक कण में,

बस उसका ही है बसेरा ।

 

सुंदरता कोई वस्तु नहीं,

यह दृष्टि का ही है विस्तार

जहाँ प्रेम है, वहीं सृष्टि का, असली है श्रृंगार ।

 

-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद,गुजरात।

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