
बादल घिर कर आए, धरती पर खुशियाँ लाए,
पपीहे की कूक सुहानी, मन में उमंग जगाए।
भीगी मिट्टी की सोंधी, खुशबू चहुँ ओर बिखरी
पेड़ों की पत्ती-पत्ती, नाच-नाच कर हरी।
नदिया की कल-कल ध्वनि, गीत नए गुनगुनाए
ताल-तलैया भर गए, मेढ़क टर्र-टर्राए।
बालक कागज की नाव, पानी में तैराए
छतरी ले कर सब , आँगन में इतराए।
विरहिन के आँगन में, सावन ने दस्तक दी
यादों की पिटारी, बरसात में ही खुली।
कवि की कलम भी भीगी, शब्दों में रस घोले
प्रकृति और मन का बंधन, सावन में ही तो बोले।
आओ मिलकर गाएँ, वर्षा ऋतु का गान
हर बूँद में बसता है, जीवन का वरदान।
****************************
ममता झा मेधा
डालटेनगंज



