
नन्ही सी कुसुमित वो कली
पहचान बनी मेरी ममता की,
मेरी बेटी मेरी शान, करेगी
प्रदर्शन मातृशक्ति और क्षमता की।
बेटी धुरी परिवार और कुल की
राखी की वह कोमल पहचान,
स्नेह,प्रेम की डोर से बुनती
बहन ही भाई की मुस्कान।
पिता देखता सदैव पुत्री में
माता का स्वरूप महान,
कभी रूठ कर कभी डपट कर
पिता से पूरे करवा लेती अरमान।
कोमल,नाजुक फूलों से वह
पर भीतर एक चट्टान रहे,
संस्कारों, मर्यादा, संस्कृति का
बोझ काँधों पर बिटिया ही सहे।
मान सदा होती है बेटी
दो कुल दो परिवारों का,
परस्पर सामंजस्य बिठाती
दो विरोधाभासी विचारों का।
प्रकृति ने दिया बेटी को ही
नवजीवन संचयन का वर,
प्रकृति बिन पुरुष है रिक्त सा
सदैव ह्रदय में स्मरण कर।
कर्तव्य बोध बना रहे निरंतर
जीवट से निभाती है वह,
अपने अंतर्मन में बनाती रहती
दुख, पीड़ा,अपमान की तह।
हृदय परतों मे छिपे स्नेह से
सराबोर सभी को कर देती है,
मेरी बेटी मेरी शान है
संताप मुस्कान से हर लेती है।
मौलिक सृजन
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तरप्रदेश



