साहित्य

ग़ज़ल

कुमार अवधेश विद्यार्थी

थक के भी राह से मैं हट नहीं सकता।
ज़िंदगी हूँ मैं, ख़ुद से कट नहीं सकता।।

धूप चाहे जितनी तल्ख़ हो सफ़र में।
मैं अपने साए से मुँह मोड़ नहीं सकता।।

टूटकर भी जो संभलना जान लेता है।
वो किसी भी हार से डर नहीं सकता।।

राह में काँटे बहुत मिलेंगे लेकिन।
पाँव चलने से कभी रुक नहीं सकता।।

आज तूफ़ान है तो क्या ग़म इसका।
कल का सूरज अभी डूब नहीं सकता।।

ज़ख़्म हँसकर जो छुपा लेता है सीने में।
वो किसी दर्द में भी झुक नहीं सकता।।

विद्यार्थी’ तूफ़ान से लड़ना ही फ़ितरत है तेरी।
हौसला है तो मुक़द्दर झुक नहीं सकता।।

कुमार अवधेश विद्यार्थी,संभल।

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