साहित्य

क्यों ना खुलकर जी लें एक बार

मधु वशिष्ठ 

क्यों न खुलकर हम भी जी लें एक बार,
जाने फिर कभी कल हो ना हो।
यूं तो औरों के लिए हम मरे हैं हर बार,
लेकिन किसी ने न सोचा हमारे बारे में एक भी बार।

जब तक हम मरते रहे सबके लिए हम बहुत ही अच्छे थे,
एक बार खुद के लिए क्या सोच लिया,
हमारी बुराइयों के ही हर जगह चर्चे थे।
अब जब चर्चे हो ही गए तो,
क्यों न खुलकर हम भी जी लें एक बार,
जाने फिर कभी कल हो ना हो।

सपनों को दफन कर दिया था अपने अंतर में ही कहीं,
जिम्मेदारियों में डूबा दिया था खुद को ही कहीं।
किसी ने हमारे बारे में सोचा भी न था हर समय,
सबको ख्याल खुद का अपना ही था।
अब जब सिर्फ अपना ही ख्याल कर लिया सबने तो,
मरने से पहले क्यों न जी लें हम भी एक बार,
जाने फिर कभी कल हो ना हो।

बेशक समय बहुत बीत गया,
लेकिन जो भी बचा है वह खुद का ही क्यों न हो?
कर लिया ख्याल सबका, अब खुद का ही क्यों न हो?
बहुत से गीत थे जो अनसुने ही रह गए,
बहुत से सपने थे जो अनबुने ही रह गए।
आज जब वही पुराना गीत बजा है तो,
क्यों न खुलकर हम भी जी लें एक बार,
जाने फिर कभी कल हो ना हो।

मधु वशिष्ठ

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