साहित्य

विचलित

नीलम अग्रवाल रत्न

हे प्रभु संतति पर दुख आया ।
दिखता चहुंँ दिश काला साया ।।
विचलित होकर काटू रैना ।
नीलम के अब भींगे नैना ।।

सुख मैंने जग कितना पाया ।
फिर दुख से मैं क्यूंँ घबराया ।।
विचलित ये मन भटके रैना ।
सागर से बहते ये नैना ।।

प्रभु थामो यह जीवन डोरी ।
आकर गाओ हे प्रभु लोरी ।।
दुख हारेगा खुशियांँ पाकर ।
जब तुम थामो मुझको आकर ।।

सुख में जोड़ी मैंने माया ।
हर्षित हो जग में भरमाया ।।
दुख में विचलित होती काया ।
सुख- दुख हैं सब तेरी माया ।।

भव तारो प्रभु जीवन नैया ।
नीलम के प्रभु गिरधर भैया ।।
आशा है बस तुमसे गिरधर ।
शीतल छाया करदो सिरपर ।।

नीलम अग्रवाल रत्न बैंगलोर
🙏🙏

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