साहित्य

मकर संक्रांति

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

सूर्य उत्तरायण हुए,मकर राशि पर राज।
खिली-खिली अब धूप है, हर्षित सकल समाज।
घी खिचड़ी तिल गुड़ महक, फैल रही चहुँ ओर,
दिव्य संक्रांति पौष की,शीश सजा है ताज।।

सूर्य छोड़ धनु राशि को,करते मकर प्रवेश।
सर्दी भी कम हो रही,कटे सभी के क्लेश।
रातें छोटी दिन बड़े,ऊर्जा का संचार,
आगम का ऋतुराज के, देता है संदेश।।

धूप गुनगुनी भा रही,कण-कण बदला रंग।
तिल गुड़ की सोंधी महक,उर में भरे उमंग।
फसलें भी लहरा रहीं, दिनकर का अवदान,
पर्व मकर संक्रांति पर,नभ में उड़ी पतंग।।

सत्य सनातन रीति पर, होता अतिशय गर्व।
स्नान दान गंगा तटों, शुरुआती यह पर्व।
उर भरता उल्लास है,बच्चे होते मग्न,
मकर संक्रांति पर सदा,चंग उड़ाते सर्व।।

पावन संस्कृति सभ्यता, भरे ज्ञान का सार।
मेल-जोल हो आपसी,बढ़े प्रीति संचार।
दीन-दुखी सब हो खुशी, खाकर खिचड़ी भोग,
मकर संक्रांति पर इन्हें, देते सब उपहार।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!