साहित्य

शगुन का लिफ़ाफ़ा

डॉ ऋतु अग्रवाल

आजकल शादियाँ भी युद्ध स्तर पर होने लगी हैं।
व्हाट्सएप पर कार्ड भेजने के साथ-साथ मिठाई के बड़े-बड़े डिब्बों और उपहारों की पोटली देकर पाहुनों को दावत हेतु न्यौता जाता है। जितनी पैसे वाली पार्टी, उतना ही बड़ा उपहार और वापसी में उतना ही बड़ा शगुन का लिफ़ाफ़ा मिलने की उम्मीद।
पाहुन भी कम घाघ थोड़े ही हैं। जितना मेजबान लाया और जितना विवाह के पश्चात मिलने की उम्मीद हो, उसी हिसाब से लिफ़ाफ़े में शगुन डाला जाता है। “कितने लोग जाएँगे” यह भी दावत के ताम-झाम पर निर्भर करता है। शादी का भोज तो लुभाव में गिना जाता है।
बाजार में एक डोसा भी पूरा न खा सकने वाला ब्याह में स्नैक्स के तमाम स्टॉल्स के चक्कर लगाता है और जिह्वा देवी को भोग लगाकर अपनी उदराग्नि को शांत करता है। फिर फ्रूट चाट, जूस, मॉकटेल इत्यादि तो लो कैलोरी वाली डिश हैं तो उनसे भला पेट पर क्या ही भार पड़ेगा।
कुछ देर अन्य मेहमानों और रिश्तेदारों से बतियाते हुए यह हिसाब लगाया जाता है कि लिफाफे में इक्यावन सौ डाले थे पर अभी भरपाई नहीं हुई तो तीन-चार घंटे पेट को आराम दिया जाता है और फिर भाग-दौड़ होती है डिनर स्टॉल्स की तरफ़।
थोड़ा-थोड़ा हर व्यंजन का लुत्फ़ लेने के बाद एक दौर कॉफ़ी और पान का लगता है ताकि गरिष्ठ भजन पच जाए और डकारें शांत रहें।
बड़ा-सा मिठाई का डब्बा और उपहार लेकर वापस लौटते हुए तसल्ली रहती है कि जो दिया मय ब्याज वापस वसूल कर ही लौटे हैं पर यह पेट भी कभी-कभी मक्कारी कर जाता है। इसका झोला ओवरलोड हो जाता है तो दस्त, उल्टी, पेट में मरोड़ का हॉर्न बजाते हुए सीधे डॉक्टर के केबिन में ही रूकता है और फिर एक शगुन का लिफ़ाफ़ा डॉक्टर और केमिस्ट के कर-कमलों में थमाना पड़ता है इस वादे के साथ कि अब दो-तीन दिन हल्का ही खाएँगे।
अब हालत यह होती है कि शगुन का हिसाब लगाने की भी हालत नहीं होती। बस चुपचाप खिचड़ी और दवाई निगलकर मुँह ढाँप कर पड़े रहते हैं और यह क्या! मिठाई के डब्बे का स्वाद तो कामवाली ले रही होती है।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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