साहित्य

दिल करता है

कवयित्री ज्योती वर्णवाल

जब अकेलापन घेरे मुझे, और वक्त ठहर सा जाता है,
पुरानी एल्बम खोलूँ मैं, बस यही दिल करता है।
उन धुंधली सी तस्वीरों में, बिछड़े चेहरे निहारूँ मैं,
जो चले गए इस दुनिया से, उन्हें जी भर के पुकारूँ मैं।
अजीब दौर है कलयुग का, हर हाथ में अब मोबाइल है,
पर बात नहीं होती दिल से, बस चेहरे पर स्माइल है।
सब व्यस्त अपनी व्यवस्था में, किसी के पास समय नहीं,
रिश्ते तो हैं पर दुनिया में, अब पहले जैसा हृदय नहीं।
तस्वीर को अपनी देखूँ तो, एक अक्स उभर कर आता है,
कि एक दिन मैं भी माँ जैसी, दिखूँगी—मन मुस्काता है।
अक्स वही, वही ममता, वही चेहरा होने वाला है,
वक्त की इस आईने में, कल माँ का रूप आने वाला है।
दिल करता है, जो पंछी होती, पंख पसारे उड़ जाती,
सात समंदर पार कहीं, अपनी माँ से मैं मिल आती।
काँधे पर रख सिर उनके, फिर बच्चा बन मैं रो लेती,
दुनयिा भर के इस शोर से दूर, माँ की गोदी में सो लेती।
दिल करता है, पंछी बन अपनी गुड़िया के पास पहुँच जाऊँ,
बरसों का जो प्यार थमा है, सारा उस पर लुटाऊँ।
उसके उलझे बालों में, अपने हाथों से तेल लगाऊँ मैं,
उसकी आँखों की हर थकान, ममता से दूर भगाऊँ मैं।
इक ख्वाब है मेरा ऐसा भी, जो पूरा कभी हो पाए,
कि तीन पीढ़ियाँ एक जगह, एक साथ कभी मिल पाएँ।
माँ हो साथ, गुड़िया हो मेरी, और बीच में मैं मुस्काऊँ,
खूब करूँ बातें, खूब हँसूँ, और फिर से मैं जी जाऊँ।

कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)
मेरी स्वरचित रचना

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