साहित्य

साक्षात्कार

नीलम अग्रवाल रत्न 

क्या हुआ रजत !
आज तो आपका साक्षात्कार है।
फिर आज सुबह -सुबह ऐसा क्या हुआ कि आपको शराब का सहारा लेना पड़ गया ।
शालू! अब मैं थक गया हूँ साक्षात्कार देते – देते ।
उन्नीस जगह से अस्वीकार कर दिया गया हूँ । हर बार नौकरी मिलने की जगह अपमानित होकर लौटा हूँ । अब और अपमान सहने की क्षमता नहीं है मुझमें ।
शालू ने कहा, रजत ! हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए । ऐसा भी तो हो सकता है कि जैसे हर अंधेरी रात के बाद सूरज सुबह नया उजाला लेकर आता है । ठीक उसी तरह आपके अपमान या शर्मिंदगी के बाद कोई बहुत बड़ी खुशी आपका सम्मान करने के लिए आपका इंतजार कर रही हो । रजत ! कई बार ऐसा होता है कि सफलता हमारे इर्द गिर्द ही होती है लेकिन हमें नजर नहीं आती । और सही रास्ता मालूम नहीं होने के कारण वहाँ तक पहुँचने में हमें महीनों या वर्षों लग जाते हैं ।
रजत ने कहा, शायद तुम ठीक कह रही हो शालू । तुम्हारी बातों ने तो मेरे अंदर रौशनी का दीप जला दिया है । मैं अभी तैयार होकर निकलता हूँ ।
शालू ने दही शक्कर खिला कर रजत को तो साक्षात्कार में सफल होने की बधाई देकर विदा कर दिया लेकिन उसे खुद पता नहीं था कि आज रजत सफल होकर आएगा या फिर आज भी असफलता मिलेगी ।
दोपहर करीब तीन बजे रजत वापस आया और आते ही शालू को बाहों में भर खुशी से झूमते हुए कहा _शालू ! शालू ! शालू !
हमें रास्ता और सफलता दोनों मिल गए हैं । हमारी जिंदगी में भी अब तारों भरी चाँदनी रात आ गई है ।

नीलम अग्रवाल रत्न
🙏🙏

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