
।।रचना शीर्षक।।
।प्रेम की नजर से देखो दुनिया बहुत रंगीन है।
।।विधा।।मुक्तक।।
1
क्यों जल -भून रहे हैं नफ़रत की आग में।
क्यों खुद ही काँटे चुन रहे अपने भाग में।।
सुन रहे हैं दिन- रात घृणा विद्वेष की ही भाषा।
रिश्ते हो रहे हैं तार- तार केवल द्वेष- राग में।।
2
संबंध भी हो रहे हैं फना घृणा की आग में।
भेंट चढ़ रहे हैं संबंधअहम गुरूर के दाग में।।
घमंड बहुत भूखा है खा जाता हर दोस्ती को।
मिल रहे बरसों के नाते मिट्टी और खाक में।।
3
अच्छे संबंधों के भीतर स्वार्थ नहीं होना चाहिए।
दिली रिश्तों को झूठे स्वांग में नहीं खोना चाहिए।।
रिश्ते-नाते संबंध नियामत बचा कर रखो इन्हें।
बाद फिर पछतावे की राख में नहीं रोना चाहिए।।
4
कम बोलो काम का बोलो यह एक सिद्ध यंत्र है।
ध्यान सुनो बात सबकी रिश्तों का अचूक तंत्र है।।
गुण अवगुण नहीं भाव और प्रेम है नींव रिश्तों की।
दिल से निकली भावना रिश्ते निभाने का मंत्र है।।
5
काम क्रोध लोभ मोह सबको दूर तार- तार करो।
बस सब मिल कर जरा प्यार और प्यार करो।।
यही दुनिया आयेगी नजर बहुत रंगीन आपको।
केवल एक दूसरे पर मिल कर जरा ऐतबार करो।।
।।एस के कपूर”श्री हंस”
बरेली।।




