साहित्य

खुद की दौड़

सुमन बिष्ट

मैं अपनी चाल से चलूँ,
किसी की परछाईं क्यों बनूँ,
मेरी धड़कन की अपनी लय है,
मैं दूसरों की ताल क्यों सुनूँ।

हर चेहरे की अपनी चमक है,
हर आँख का अपना आसमान,
तुलना की धूल में खो जाए,
तो मिट जाएगी मेरी पहचान।

मैं जो हूँ, वही मेरी ताक़त है,
कमज़ोरी भी मेरी सीख है,
जब दूसरों की ऊपर बढ़ता देखूँ ,
तब खुद अपने को क्यों कम आँकूँ?

मेरी जीत का पैमाना अलग है,
मेरी हार की भाषा है कुछ और,
किसी और की मंज़िल देखकर,
क्यों बदलूँ मैं अपनी डगर।

ईर्ष्या की आग में जलकर,
मन का चैन खो जाता है,
संतोष की अनुभूति मिल जाए,
तो जीवन फूल सा बन जाता है।

खुद की खुद से तुलना करूँ, और
कल से बेहतर बनने की ठानूँ,
दूसरों की दौड़ देखना छोड़कर,
सिर्फ मैं अपनी दौड़ को पहचानूँ।

सुमन बिष्ट, नोएडा

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