साहित्य

जीवन की साँझ

शशि कांत श्रीवास्तव

जीवन की इस साँझ में -प्रिये
रह जायेंगे सिर्फ….,
हम और तुम…..
बनकर साथी एक दूजे के प्रिये,
जीवन की इस साँझ में…|
कोई भी नहीं है संग हमारे
है सभी कोई मस्त अपने में प्यारे
जीने को उनको
अपनी जिंदगी अपने तरीके से,
हमने तो जी ली है अपनी जिंदगी,
जीवन की इस साँझ में -प्रिये
रह जायेंगे सिर्फ हम और तुम -प्रिये,
आओ… चलो… चलें…
उम्र की इस दहलीज पर
अपने काँपते हाथों से
फिर से तुम्हें सजा सँवार दूँ प्रिये,
जैसे पहले तुम सजती सँवरती थी
सिर्फ हमारे… हमारे लिए प्रिये….,
जीवन की इस साँझ में -प्रिये ||

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब
©स्वरचित मौलिक रचना

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