
राम जी के बिना कोई काम कब हुआ?
यह बात सारी दुनिया , सृष्टि को मालूम है
जब धरा दबी त्रेता में
दानव रावण के पाप, अत्याचारों से
व्रती ऋषि ,मुनियों , तपस्वियों की तपस्या
यज्ञ , धार्मिक कर्म कांड को
मायावी असुर भंग करते थे
अधर्म , अन्याय , अनीति का बोलवाला था
करते थे स्वछंद असुर हैवान
बुद्धिजीवी ऋषियों का संहार
तेजस्वी ऋषियों को यज्ञशाला में
नर भक्षक असुर
बाल पकड़ ऋषियों की हत्या कर देते थे
हैवानियत से धरा डांवाडोल थी
अपराधियों की मनमानी चलती थी
इंसानियत तो मारी गयी
त्राहि मम की चीत्कारों से
गूँजी दसों दिशाएँ
तब यह कुकृत्य देख के देवलोक रोया था
ऐसे घोर निराशा के क्रूर अंधकार में
चैत्र मास शुक्ल नवमी पर
सुष्ठ पुनर्वासु नक्षत्र की पावन बेला की
कर्क लग्न में
तब मैया सरयू की लहरें थिरकीं थीं
गद्गद हुयी शीतल समीर
शुचिता ,दिव्यता, धर्म की अलौकिक शक्ति
मानव मंगल , जग कल्याण हेतु
अवध के राजा दशरथ की
रानी कौशल्या की कोख से
जगत विधाता राम लला जी जन्मे थे
राम नाम तिहरा अति पावन है
महर्षि अगस्त्य समुद्रस्थ असुरों से
देव मुक्ति हेतु
जय श्री राम बोल के
सकल समुद्र पी गए थे
मिला जब चौदह वर्ष का वनवास
राह पड़ी शापित शिला को प्रभु ने
अपनी चरणधूलि से नारी अहिल्या को
मोक्षधाम था भेज दिया
राजमहल में ईश ने कभी झूठन नहीं खायी थी
शबरी के प्रेम पगे झूठे बेर खा के
उपेक्षित , पीड़ित , दलित को गले लगा के
समता , समरसता , सामजिकता का पाठ पढ़ा दिया
दण्डक वन में जाकर प्रतापी राम ने
क्रूर दुष्ट , पापी विराध नरभक्षी को जिंदा
गड्ढे में गाढ़ के शाप मुक्त था किया
प्रतिकूल विषम चुनौतियों में
कर्तव्य पथ को राम ने पूजा था
स्वार्थ , आतंक , हिंसा , ऊँच – नीच , अधर्म,
नारी हरण के अँधेर युग में
धर्म , प्रेम , सत्य , भाईचारा , मैत्री , करुणा, धैर्य
आदि दैवीय गुण , मूल्यों की दौलत से
पुनः स्थापित किया रामराज्य था
करते सकल जगत के काज
मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी।।
डॉमंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई




