आलेख

महिला सशक्तिकरण और दहेज प्रथा परंपरा, परिवर्तन और प्रगतिशील सोच का संगम

कविता ए झा

संस्कृति व्यक्ति के आंतरिक गुणों को प्रकट करती है कि व्यक्ति वास्तव में कैसा है,उसकी सोच, उसका आचरण और उसके जीवन-मूल्य किस स्तर के हैं। सभ्यताएँ निरंतर समय के साथ प्रगतिशील होकर बदलती रहती हैं, नए आयाम ग्रहण करती हैं और आधुनिकता के साथ स्वयं को ढालती हैं जबकि संस्कृतियाँ अपेक्षाकृत स्थिर होती हैं।
वे हमारे पूर्वजों की अमूल्य धरोहर के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं और हमारी वंशानुगत पहचान बन जाती हैं। इसीलिए इन्हें बदलना न केवल कठिन होता है, बल्कि इसके लिए संवेदनशील और जागरूक प्रयासों की आवश्यकता होती है।

भारतीय संस्कृति हमारी सांस्कृतिक अस्मिता की आधारशिला है,
एक ऐसा विराट वृक्ष जिसकी शाखाएँ विविध परंपराओं, भाषाओं और रीति-रिवाजों से सजी हैं।
इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक और बहुरंगी है। इसी बहुलता में एकता का अद्भुत उदाहरण है मैथिल संस्कृति, जो अपनी विशिष्ट पहचान, गरिमा और परंपराओं के माध्यम से राष्ट्रीय संस्कृति को निरंतर समृद्ध करती रही है।

मैथिल विवाह परंपरा अपने गहन सांस्कृतिक महत्व, शास्त्रीय आधार और अनूठे अनुष्ठानों के कारण अत्यंत विशिष्ट मानी जाती है। इसकी चर्चा दूर-दूर तक होती है। यह मान्यता है कि भगवान शिव और पार्वती का दिव्य विवाह तथा प्रभु श्रीराम और माता जानकी का पावन परिणय जिन रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ था, उन्हीं परंपराओं की छाया आज भी मिथिला के विवाह संस्कारों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

यहाँ विवाह केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि एक दीर्घ सांस्कृतिक उत्सव होता है, जो विवाह उपरांत भी एक वर्ष तक विभिन्न रस्मों और पर्वों के माध्यम से जीवंत बना रहता है। विवाह से पूर्व कुंडली मिलान, हल्दी की रस्म, तिलक जैसे संस्कार होते हैं, तो विवाह के पश्चात कोजगरा, मधु श्रावणी और अन्य पर्व-त्योहारों पर वर और वधू पक्ष के बीच प्रेमपूर्ण उपहारों,वस्त्र, मिठाइयों और स्नेह से भरे प्रतीकों,का आदान,प्रदान होता है।
यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि रिश्तों को सुदृढ़ करने की एक भावनात्मक प्रक्रिया है।

इसी गौरवशाली मिथिला विवाह परंपरा को और भी अर्थपूर्ण और प्रेरणादायी बना रही हैं आदरणीया रीता चौधरी और आशीष झा जी।
ये दोनों व्यक्तित्व दहेज रूपी सामाजिक बुराई के विरुद्ध एक सशक्त आवाज बनकर उभरे हैं। इन्होंने बिना दहेज के विवाह मंच को निष्ठापूर्वक संचालित कर समाज के समक्ष एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

इस पहल की सबसे प्रेरणादायक बात यह है कि आदरणीया रीता जी का स्वयं का विवाह 22 वर्ष पूर्व दहेज मुक्त रहा। उसी अनुभव और दृढ़ संकल्प ने उन्हें आज समाज के लिए एक मार्गदर्शक बना दिया है। उनके कार्यों में केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन का सच्चा अनुभव और समर्पण झलकता है।
यही कारण है कि रीता जी और आशीष झा को समाज सुधारक, आदर्शवादी, क्रांतिकारी और सच्चे प्रगतिशील व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है।

ये लोग महिला सशक्तिकरण के प्रबल समर्थक हैं और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ डटकर खड़े होकर समानता, सम्मान और स्वाभिमान का संदेश देते हैं। संयोगवश आशीष रंजन झा का विवाह भी दहेज रहित होने जा रहा है, और इससे भी बढ़कर, वे वधू पक्ष का सम्पूर्ण खर्च स्वयं वहन कर रहे हैं—यह केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का एक सशक्त उद्घोष है।

इनकी प्रशंसा के लिए कुछ शब्द,
सच्चा आदर्शवादी जो दिखावे और लालच से ऊपर उठकर विवाह को एक पवित्र बंधन मानते हैं।
सामाजिक क्रांतिकारी जो जड़ और रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़कर समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला रहे हैं।
महिला सम्मान के पैरोकार जो लड़की को बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की अमूल्य संपत्ति मानते हैं।
सशक्त युवा जो बिना दहेज के भी गरिमामय, सम्मानजनक और प्रेरणादायक विवाह करने का साहस रखते हैं।

आज जब समाज के अनेक वर्ग अब भी दहेज जैसी कुप्रथा के बंधन में जकड़े हुए हैं, ऐसे में इस प्रकार के प्रयास आशा की किरण बनकर उभरते हैं।
ऐसे युवकों और समाजसेवियों को केवल सराहा ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि उनके विचारों को व्यापक स्तर पर अपनाया जाना चाहिए।

वे वास्तव में दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की भावना को साकार रूप दे रहे हैं,
एक ऐसा समाज जहाँ विवाह सौदेबाजी नहीं, बल्कि समानता, प्रेम और सम्मान का उत्सव बने।

यह लेख केवल एक परंपरा का वर्णन नहीं, बल्कि एक संदेश है,
कि जब संस्कृति और प्रगतिशील सोच का संगम होता है, तब समाज में वास्तविक परिवर्तन संभव होता है।

कविता ए झा, नवी मुंबई

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