
लोग ऊन से स्वेटर बुन लेते हैं,
मैं शब्दों से कविता बुन लेती हूं।
लोग हाल पूछते हैं सबका,
मैं बिना पूछे सब जान लेती हूं।
एक-एक अक्षर को मिलाकर,
शब्दों का एक जाल सा बना लेती हूं।
लोग बहुत कुछ छुपाते हैं मुझसे,
खामोश दिल का भी हाल बता देती हूं।
मन में पीड़ा के उलझे धागे होते हैं,
सब्र से मैं उन्हें जैसे सुलझा देती हूं।
आंखों में उम्मीद लिए जो देखते हैं मुझे,
उनके जीवन की कविता बना देती हूं।
खामोश निगाहें बता देती हैं कहानी मुझे
मैं उनके जख्म को सहला देती हूं।
देते हैं सुख-दुख के धागे वह मुझे,
और मैं प्यार से कविता बुन लेती हूं।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




