आलेख

बुद्धत्व का सार: शून्यता से पूर्णता तक़

डो. दक्षा जोशी निर्झरा

बोध का उदय: बुद्ध का जन्म केवल देह का आगमन नहीं, बल्कि उस विवेक का प्रकटीकरण है जो बाहरी संघर्षों (जैसे कलिंग) के बजाय आंतरिक द्वंद्वों और ‘मैं’ के अहंकार को मिटाने से उपजता है।
इच्छा और दुःख: दुःख कोई बाहरी आपदा नहीं, बल्कि हमारी तृष्णा का परिणाम है। जब ‘मैं’ की सीमा समाप्त होती है, तभी सत्य का साक्षात्कार होता है। जैसे लहर का अस्तित्व सागर से अलग नहीं, वैसे ही हमारी आत्मा की व्याकुलता तब शांत होती है जब वह अनंत में विलीन हो जाती है।
शून्यता का गणित: बुद्ध का दर्शन हमें सिखाता है कि संसार को त्यागना नहीं, बल्कि उसके मिथ्या होने के भ्रम को त्यागना ही वास्तविक मुक्ति है। शून्य यहाँ अभाव नहीं, बल्कि वह पूर्णता है जिसमें समूचा ब्रह्मांड समाहित है।
द्रष्टा भाव: निर्वाण वनों में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। प्रतिक्रिया के स्थान पर तटस्थ होकर स्वयं को ‘द्रष्टा’ बना लेना ही मध्यम मार्ग है।
बुद्धत्व हर मनुष्य के भीतर छिपी वह संभावना है, जहाँ व्यक्ति भीड़ के कोलाहल में भी अपने भीतर के मौन और एकांत को खोज लेता है। ‘अप्प दीपो भव’ के मंत्र के साथ स्वयं का प्रकाश बनना ही इस बोध का अंतिम लक्ष्य है।

-डो. दक्षा जोशी निर्झरा अहमदाबाद,गुजरात।

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