
भोर हुई सुरज निकला।
नई आशाओं नई उम्मीदो के साथ।
दो जून की रोटी के लिए चला किसान के संग।
कंधों पर लिए हल और लिए कंधों पर जिम्मेदारियां मन की नई उमंग आशाओं के दीप।
मुश्किलों के राह पर चला अपना धैर्य बनाकर दो जून की रोटी के खातिर।
खेतों में किसान भीषण गर्मी से पसीना बहाकर हल जोतता है।
दो जून की रोटी के खातिर।
कारीगर ईट से ईट जोड़कर मालिकों के घर बनाकर सपनो करता है साकार।
अपने दो जून की रोटी के खातिर।
दो जून की रोटी के खातिर संघर्षों से जुझते हैं। गर्मियों में अपने शरीर का पसीना बहाकर।
कड़ी मेहनत की कमाई से घर का चूल्हा जलता है।
रोटी की मंद मंद खुशबू से परिवार का पेट भरता है।
#सुरेंद्र कुमार बिंदल वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं रचनाकार मॉडल टाउन जयपुर राजस्थान।
#स्वरचित मौलिक रचना।



