साहित्य

घर की धुरी

सुमन बिष्ट

नारी हर घर की धुरी थी,

हर घर का मजबूत आधार थी।

हर रिश्ते की सच्ची डोर,

हर खुशियों का संसार थी॥

 

सुबह की पहली किरण संग जाग जाती थी,

सबके सपनों को अपनी नींद दे जाती थी।

थकान छुपाकर होठों पर मुस्कान सजाती,

अपनों की खातिर खुद को हर दिन भूल जाती॥

 

न धन की अभिलाषा थी, न कोई बड़ा नाम,

बस चाहा था मिले उसके हिस्से का सम्मान।

दो मीठे शब्द, थोड़ा सा अपनापन मिलता,

तो उसका सारा जीवन फूल बन खिलता॥

 

पर जब उसके श्रम को सहज मान लिया गया,

उसके अस्तित्व को ही बेमानी समझा गया।

जब हर त्याग के बदले प्रश्न खड़े किए गए,

और उसके सपनों पर पहरे बिठा दिए गए॥

 

जब भी इस भावुक नारी ने,

अपने अस्तित्व के बारे सोचा।

क्या उसकी पहचान केवल रिश्तों तक सीमित है?

क्या उसकी मेहनत का मूल्य बस कर्तव्य ही है?

 

फिर वो निकली अपनी राह बनाने को,

खुद के भीतर छिपी शक्ति को जगाने को।

न घर से उसे कोई बैर था, न परिवार से दूरी,

बस तलाश रही थी अपने होने की मजबूरी॥

 

आज अगर वो आकाश में अपने पंख पसार रही है,

तो समझो, बरसों की चुप्पी को आवाज़ दे रही है।

वो घर भी चाहती है, सम्मान भी चाहती है,

अपने सपनों को भी जीने का अधिकार चाहती है॥

 

स्त्री जब सबसे सम्मान पाती है,

तब हर घर स्वर्ग बन जाता है।

उसके व्यक्तित्व का उजियारा,

पूरे घर आँगन में छा जाता है॥

 

यदि घर को घर बनाए रखना है,

तो उसके त्याग का मूल्य पहचानना होगा।

जिसने सबको जीवन भर अपना माना है,

उसे भी अपने होने का एहसास दिलाना होगा॥

 

तब न कोई घर बिखरेगा, न रिश्ते टूटेंगे,

सम्मान व प्रेम के दीप हर आँगन में जलेगा।

घर सँभालने वाली वह नारी मुस्कुराएगी,

जब अपने घर में अपना आसमान पाएगी।॥

 

स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति

सुमन बिष्ट, नोएडा

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