साहित्य

सुकर्म

उदय किशोर साह

जीवन में देना सुकर्म को मान सम्मान
सुकर्म से बदलेगी तेरी भी      पहचान
कुकर्मी जगत में है   सर्वत्र ही बदनाम
अच्छा कर्म कर बन   जाना है इन्सान

कुक़र्म की कुंडली कोई काम कब आई
बदनामी का पट्टा गले में        लटकाई
गलत राह जब तेरी करती      अगुवाई
सभ्य समाज में होती तब तेरी रूसवाई

जीवन में पाना है जब शांति व खुशहाल
ईमानदारी से जीना     भले हो फटेहाल
लोग भले ही तुमको कहे कोई    कंगाल
शर्म से  झुक जायेगा बदनामी की भाल

सुकर्म का वृक्ष मीठा   फल का है  दाता
बदले में शांति सकून दे हमें वो समझाता
बदनामी का मुँह बन्द कर        लजवाता
जब सुकर्म  सामने खड़ा हो   दिखलाता

जीवन है अर्पण सर्मपण का एक दर्पण
हँसता चेहरा दिखलाता है     ये तन मन
अतएव बनाना सुकर्म को तुँ     यजमान
समाज में दिलायेगा ये मान व।   सम्मान

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार

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