
*अधिकार* बोला ऊँची छत से –
“मैं आसमान हूँ, मुझे पाने की ज़िद कर!”
*कर्तव्य* बोला मिट्टी से लिपटकर –
“मैं जड़ हूँ, पहले मुझे निभाने की हिम्मत कर।”
अधिकार कहे – “मैं तेरा हक़ हूँ,
तू लड़े, तू चीखे, तू माँगे।”
कर्तव्य हँसा – “मैं तेरा फ़र्ज़ हूँ,
तू झुके, तू सींचे, तू त्यागे।”
अधिकार रोटी है थाली में रखी,
सबको चाहिए, सबका सपना।
कर्तव्य चूल्हा है आँगन में,
जो जले तो ही रोटी अपना।
मैंने पूछा बापू की तस्वीर से –
“पहले क्या? हक़ या फ़र्ज़?”
बापू बोले – “बेटा, नदी से पूछ,
पहले बहना ज़रूरी है या तरना?”
जो सिर्फ अधिकार चिल्लाता है,
वो महल में भी भिखारी है।
जो चुपचाप कर्तव्य निभाता है,
उसकी झोपड़ी भी सरकारी है।
क्योंकि *अधिकार माँगने से मिलता है,*
*पर टिकता सिर्फ कर्तव्य से है।*
पेड़ फल देता है सबको,
पर पहले खुद धूप में जलता है।
—
ममता झा मेधा
डालटेनगंज




