साहित्य

सूखी धरती तपता अंबर,तापमान बढ़ता जाए

सुनीता सिंह

गर्मी से बेहाल हुए सब, नभ बदरा नजर न आए।।

कौन बुझाए प्यास धरा का, कौन बुलाए घन कारे।

कैसे हो बरसात धरा पर ,जब कानन काटे सारे।।

 

अब तो चेतो बंधु सखा सब,वृक्ष धरा का गहना है।

पादप से ही धरती जॅंचती, यही सभी का कहना है।।

वृक्ष बुलाते जलधर काले, ले आते बरसात तभी।

मधुर पवन के झोंके से ही,खुश होते नर नार सभी।।

 

राहत मिलती गर्मी से फिर, सूखी नदियाॅं लहराती।

हरियाली से सजकर वसुधा, इठलाती है इतराती।।

नव दिन का नौतपा हटे तो, बरखा आती मुस्काती।

नरमी आता मौसम में भी, रिमझिम बूॅंदे मनभाती।।

 

कोकिल दादुर झिंगुर गाते, वन मोर थिरकता नाचे।

अमियाॅं जामुन लीची मीठी, चख तोता पोथी वाॅंचे।।

धान रोपते कृषक खेत में, कजरी ठुमरी मिल गाते।

शीतल बरखा की बूॅंदों से, गर्मी से राहत पाते।।

 

सुनीता सिंह सरोवर 🙏

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