साहित्य

आग उगलती धूप,

डॉ रामशंकर चंचल

सालों हो गए, बचपन से आज तक उम्र के 70 सत्तर साल में भी वह

आग उगलती धूप देख रहा है, सोमाल, और देश के करोड़ों गांवों के सभी लोग इसी को जीवन मान जी रहे यह लोग नहीं जानते हैं

धूप से भी बचा जा सकता है

न कभी किसी से भीख मांगते हैं फिर वह ऊपर वाला भगवान क्यों न हो, जीना है इसी तरह यह देख रहे हैं सदियों से और यह सब स्वीकार करते हुए सदा खुश, मस्त ओर प्रसन्न हो लगे रहते हैं रोज़ रोज़ इस आग सी सुलगाती धूप में अपने कर्म में रोज़ी रोटी की तलाश में दौड़ता भागता है पूरा गाँव सदियों से धरती पर दस्तक देता यह मानव जीवन सचमुच बहुत वंदनीय हैं जो सदा खुश हो प्रसन्न हो जीने का अद्भुत सत्य मंत्र दे रहा है

काश हर मानव मात्र यह स्वीकार कर लें हम जैसे है अच्छे हैं यहीं जिन्दगी है जो परम् शक्ति ईश्वर कृपा से मानव जीवन मिला है

सचमुच बेहद सुखद अहसास करता हुआ दुःख दर्दों, धूप , बारिश आदि आदि सैकड़ों से सामना करता हुआ सदा खुश हो प्रसन्न हो जीता हुआ नज़र आए चाहिए केवल आप की अद्भुत सोच और आत्मा विश्वास जिंदा रह कर सतत् कर्म पथ पर दस्तक देने की लगन और निष्ठा फिर आग उगलती धूप हो या कोई भी पीड़ा दर्द बस चाहिए उसे ईश्वर इच्छा समझ स्वीकार करें और सतत् कर्म साधना में लगे रहे उस ईश्वर पर हर पल विश्वास करते हुए देखे फिर जीवन को हर हाल में प्रसन्न मस्त और जब आप प्रसन्न और खुश रहेंगे तो ऊर्जा ताकत स्वतं बनी रहेगी आप के साथ साथ पास और जीवन सार्थक करने के लिए सुखद व्यतीत करते के लिए चाहिए भी क्या बस इतना मन और आत्मा सदा स्वस्थ रहे मस्त रहे खुश रहे प्रसन्न रहे

 

 

डॉ रामशंकर चंचल

झाबुआ मध्य प्रदेश

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