
दहेज का दानव,,,,
दहेज का दानव कितनी ही जिंदगी को निगल जाता है,
कच्ची कलियों को फूल बनने से पहले ही मसल दिया जाता है।
दहेज की अंधी दौड़ में जाने कितने घर उजड़ गए हैं?
रिश्तो के पवित्र बंधन अब सौदे के बाजार बन गए हैं।
रिश्तो में अब प्रेम और विश्वास का नामो निशान मिटता जा रहा है,
मासूम बेटियों के सपनों का संसार दहेज में जलते जा रहा है।
दुल्हन ही दहेज है यह लोग क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?
क्यों अपने ही बच्चों की खुशियों में दहेज की आग लग रहे हैं।
बहु घर की इज्जत होती है उससे ही आती है खुशियां अपार,
दहेज न लेकर उसे सम्मान दो यही चाहता है संसार।
दहेज की कुप्रथा को हटाकर दुल्हन को अपनाओ,
बेटे बेटी में भेद न कर नए समाज का निर्माण कराओ।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




