साहित्य

कविता

डॉ. संगीता

हँसी तुम्हारे चेहरे पर,

जैसे है सुबह की उजली धूप,

जो भर देती है दामन मेरा-,

खुशियों से-

उमंगों से-

चाहतों से-

गुस्सा तुम्हारे चेहरे पर,

जैसे नीरवता का अंधकार,

जो घेर लेती है मुझे-,

उदासी से-

निराशा से-

मायूसी से-

ऐसे में मैं घिर जाती हूँ मैं,

अनगिनत सवालों से कि-

तुम्हारे कौन से रूप को,

मैं सच मानूँ?

पर मुझे पता है,

अभी मुस्करा दोगे तुम,

क्योंकि-

एकाएक आँधी का आना,

प्रकृति का एक रूप है,

उसका स्वभाव नहीं।

——————-डॉ. संगीता पाण्डेय “संगिनी ”

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, (पी, एस, एम, पी.जी. कोलेज, कन्नौज )

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