साहित्य

आज की –नारी

शशि कांत श्रीवास्तव 

कभी – नारी होती थी

पूज्यनीय-बचपन से बुढ़ापा तक

किन्तु – आज की-नारी- है लाचार

रोज पढ़ो और सुनो -नारी-उठती

बीच बाजार- और होती इज्जत तार तार

कहीं पर फेकते-तेज़ाब- मुँह पर

तो- कहीं पर करते सीमा पार

फिर देते हैं उसको मार

छिपाने को अपना गुनाह

कहीं-कहीं पर होती हैं-वह

घरेलू हिंसा की शिकार

वह भी अपने परिजन बीच

-और-

चढ़ती बलि-वेदी पर वह

कारण होता-दहेज व्यापार

कहीं नहीं है आज सुरक्षित

आज की भोली भाली नारी

अपनों ने अपनों को मारा

फिर भी होती है-नारी-बदनाम

 

शशि कांत श्रीवास्तव

डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब

स्वरचित मौलिक रचना

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