साहित्य

हमारे पिता स्व प्रेमपाल वार्ष्णेय के साथ संसार के पिताओं को समर्पित दोहे।

डॉ मंजु गुप्ता 

दोहे में पिता

 

उपकारों के तात का ,नहीं और औ छोर।

पिता – पुत्र के बीच – सा,कहीं न मिलती डोर।।

 

खिला -खिला कर गोद में , करते हमको प्यार ।

पूरी ख्वाहिश कर सभी , करते खूब दुलार ।।

 

बनकर घोड़ा खेलते , बच्चों से हर हाल।

भर के गागर प्रेम की , बचपन करें निहाल।।

 

पालक जीवनक्रम के , करते सारे काम ।

 

पग चलना सीखा प्रथम ,पिता – अँगुलियों थाम।।

 

नहीं ककहरा याद जब , रटवायें हर बार ।

 

जीवन – गुरु बनकर सदा , देते सीख हजार।।

 

गीता , वेद पुराण सम , देय गूढ़ नित ज्ञान ।

 

ठोस बनाया ‘ आज’ को , फिर भावी सौपान ।।

 

भरी पिता की बात में, मधु सम मधुर मिठास।

प्रेम – कलश रीते नहीँ , भरें खुशी ‘ औ ‘ हास।।

 

इबादत , पिता की करो ! वे हमरे भगवान।

 

धुरी – कुटम्बी आप हो , घर का चक्र महान।।

 

लिए ईश के रूप वे , भू पर सद्गुण खान।

 

स्वाभिमान घर -बार के , तुम से सकल जहांन ।।

 

चमके मुख पर तेज ज्यों , हो पूर्णिमा – प्रकाश।

 

शिक्षित कर संतान को , भरे ज्ञान आकाश ।।

 

दिल – दर्पण टूटे जभी , बाँधे ढाढस – डोर ।

 

अंधे घेरों में उगे , सुखद चमकती भोर ।।

डॉ मंजु गुप्ता

वाशी ,नवी मुंबई

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