
दोहे में पिता
उपकारों के तात का ,नहीं और औ छोर।
पिता – पुत्र के बीच – सा,कहीं न मिलती डोर।।
खिला -खिला कर गोद में , करते हमको प्यार ।
पूरी ख्वाहिश कर सभी , करते खूब दुलार ।।
बनकर घोड़ा खेलते , बच्चों से हर हाल।
भर के गागर प्रेम की , बचपन करें निहाल।।
पालक जीवनक्रम के , करते सारे काम ।
पग चलना सीखा प्रथम ,पिता – अँगुलियों थाम।।
नहीं ककहरा याद जब , रटवायें हर बार ।
जीवन – गुरु बनकर सदा , देते सीख हजार।।
गीता , वेद पुराण सम , देय गूढ़ नित ज्ञान ।
ठोस बनाया ‘ आज’ को , फिर भावी सौपान ।।
भरी पिता की बात में, मधु सम मधुर मिठास।
प्रेम – कलश रीते नहीँ , भरें खुशी ‘ औ ‘ हास।।
इबादत , पिता की करो ! वे हमरे भगवान।
धुरी – कुटम्बी आप हो , घर का चक्र महान।।
लिए ईश के रूप वे , भू पर सद्गुण खान।
स्वाभिमान घर -बार के , तुम से सकल जहांन ।।
चमके मुख पर तेज ज्यों , हो पूर्णिमा – प्रकाश।
शिक्षित कर संतान को , भरे ज्ञान आकाश ।।
दिल – दर्पण टूटे जभी , बाँधे ढाढस – डोर ।
अंधे घेरों में उगे , सुखद चमकती भोर ।।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी ,नवी मुंबई




