
आ गया फुटबॉल का मौसम,
गली-गली में शोर हो रहा,
भागा,आया,मारी ठोकर,
और हो गया गोल।
आ गया फुटबॉल …
कोई दे रहा पास यहां पर,
कोई सिर से करता गोल,
तनिक चूक हो जाती है तो,
पल में हो जाता है गोल।
आ गया फुटबॉल ….
यूं तो गोल नहीं भाता है,
पर मैदानों में जो करता गोल,
खूब तालियां पाता है वह,
और बजवाता ढोल।
आ गया फुटबॉल …
गोली जब खाता है गोल,
आंखें करता गोल-मटोल,
यही तिलस्म है इस खेल का,
और सारा है भूगोल।
आ गया फुटबॉल …
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कार्तिकेय त्रिपाठी ‘श्रीतिक’
गांधीनगर इन्दौर




