साहित्य

प्रकाशनार्थ रक्तदान 

अवधेश कुमार श्रीवास्तव

रक्तदान है महादान,नव प्राण मिलें बहु तेरों को,

ह्रास नहीं तन का कुछ होता,पुनः बने,बहु फेरों को,

बस दो चार दिनों के अंतराल में,बन जाता रक्त पुनः उतना 

अब फिर से तैयार बदन तेरा,दे सकता खून बहु तेरों को।।

 

हर एक बूंद में जीवन है,जीवन का सम्मान है इससे

दान नहीं कोई और है दूजा,तेरा सम्मान बढ़े जिससे,

जब सांसें थमने लगती हैं,कहता डाक्टर है खून चढ़ाना,

उस पल विशेष में यही रक्त आता काम बचें प्राण जिससे।।

 

हाथ पसारे याचक बन प्राणों की भीख मांगता कोई,

ग्रुप विशेष जब मिले न उसको,दानी ही

देता तब कोई,

डोनर लेटा एक तरफ एक बेंच पर पड़ा चहेता

कितनी संतुष्टि मिलती उसको जब दुआ है देता कोई।।

 

तन में जब है कभी खून की, आपूर्ति खून से ही होगी

इन्हीं पलो की खातिर रक्तदान की पद्धति चली होगी

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे तब नहीं काम आते भाई

हां दुआ आशीष तो शुभकर है,पर खून है बात बनी होगी।।

 

रक्तदान बस दान नहीं,यह प्राण बचाने की औषधि,

आज कहां है सुलभ वनस्पति, संजीवनी की सी औषधि,

तब तो रक्त दान करना उत्तम और पुण्य का द्योतक 

मत डरो कहीं कुछ कम होगा,करो दान,बन जाए औषधि।।

 

अवधेश कुमार श्रीवास्तव उन्नाव उत्तर प्रदेश

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