साहित्य

मन का मयूराभोले

कार्तिकेय कुमार

मन का मयूरा भंवरे जैसा,

जब-जब घूमा करता है,

तब-तब आस बंधा करती है,

भोले से मिल जाने की।

मन का मयूरा ….

वो कब आए मन के द्वारे,

पता नहीं चल पाता है,

भोले भक्ति की डोर से बंधकर,

भोले की और खिंच जाता है।

मन का मयूरा …

जीवन है एक राग पुराना,

भोले के संग मिलकर गाना,

पशुपतिनाथ के दर्शन करके,

पशु योनी फिर कभी नहीं पाना।

मन का मयूरा …..

निराकार है शिव की शक्ति,

जैसी तुम अंतस में बांधों,

डगर-डगर भोले की भक्ति,

से अपना जीवन तुम साधो।

मन का मयूरा …..

आओ भोले-भोले कहकर,

हम अपना जीवन तर जाएं,

सांझ सवेरे हम भोले संग,

मन भर कर हम सब मुस्कालें।

मन का मयूरा …..

(274/332वां मनका)

“””””””””””

कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’

गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.)

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