
ज़िंदा-दिली ख़ुद से न तू छोड़ें
मुस्कान हो लबों पर उसे न मोड़ें
दुनिया की ख़ुशी का जो ख़याल रखे
वो ख़ुद से कभी न यूँ नाता तोड़े
ऐ राह की निर्झरा होश में आ
आईने में जो दिखें, उसे न छोड़ें
तन्हाइयों के बोझ को तू कम कर ले
ग़म के जो स्याह साये , उन्हें अब छोड़ें
ये ज़िंदगी एक अक़्स है तेरा ही
तू ख़ुद से ख़ुद का नाता
अबसे कभी ना तोड़ें।
-डॉ. दक्षा जोश’निर्झरा’ अहमदाबाद,गुजरात।



