साहित्य

ख़ुशामद

राजीव त्रिपाठी 

ख़ुशामद का भी अपना मज़ा है

यहांँ दोस्ती भी एक सज़ा है!!

कब बदल जाए मालूम नहीं

दिल के टुकड़ों की दास्तांँ है!!

ज़िन्दगी ने हैरान कर दिया सबको

अब तो मरना भी जैसे दुआ है!!

ग़ाफ़िल नहीं है हालात पर मेरे

बस मौसम ही धुआँ धुआँ सा है!!

चंद लम्हों में कह नहीं सकता

ख़ता किसकी किसको सज़ा है!!

ज़िंदा है जब तक नज़र आते हैं

वर्ना हमें भूलने का सिलसिला है!!

मुकर गया वह शेर कहते-कहते

प्यार की बस यही इंतहा है!!

तुमको सुकून यूंँ ही मिलता रहे

हमारी तो गलतियांँ ही सज़ा है!!

किससे कहें हम जाकर अपने ग़म

हर तरफ पाबंदियांँ ही पाबंदियाँ है!!

भूलकर उनको किधर जाएंगे

सबका बस एक ही मशवरा है!!

 

स्वरचित- राजीव त्रिपाठी

उदयपुर राजस्थान

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