साहित्य

मुखौटे बनाम हकीकत

मदन वर्मा

चराग बन के जल सकेगा क्या?

मोम बन के पिघल सकेगा क्या?

तूने जूते तो मेरे जैसे पहन लिये मगर,

तू मेरे जैसा चल सकेगा क्या?

तस्वीर मेरी चुरा कर अपनी दीवार पर सजा ली,

पर जो तपस्या थी मेरी, वो तप तू कर सकेगा क्या?

चाल ढाल की नकल तो बड़ी खूबी से कर ली तूने,

जो घाव खाए हैं पैरों ने, वो दर्द सह सकेगा क्या?

ऊपर-ऊपर से ओढ़ ली तूने मेरी ये सादगी,

भीतर जो अंगारे हैं, उन्हें निगल सकेगा क्या?

बाजार से खरीद लाया हूबहू मेरे जैसी पोशाक,

मगर जो रूह का झुलसना है, वो बदल सकेगा क्या?

सस्ते रंग लगा कर तूने चेहरा तो चमका लिया,

वक्त की धूप में वो रंग, बिखरने से बचा सकेगा क्या?

चराग बनने की जिद में कहीं खुद को राख न कर लेना,

बिना रीढ़ के इस दौर में, तू सीधा खड़ा रह सकेगा क्या?

 

— मदन वर्मा “माणिक”

इंदौर, मध्यप्रदेश

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