देखा है तुमने हमको, मेरे अंदर नहीं है देखा*
*सबको समेट ले, वो समंदर नहीं है देखा..*
बेदर्द आंधियों में मुस्कुराता रहा था जो,
टूटा जो और बिखरा, वो पत्थर नहीं है देखा..
आँँखों में नमी थी मगर होंठों पे हंसी थी,
इतना सब्र करे वालाह , कोई कलंदर नहीं है देखा..
वादों के ताजमहल बनाये हर गली में
पूजित हो नींव पत्थर , वो घर नहीं है देखा..
भूखे को रोटियों का देता रहा निवाला,
दौलत के बाजारों में, वो लंगर नहीं है देखा..
बच्चों की खातिर रात-दिन जागे जो बाप माई,
ममता लुटाने वाला , कोई मंजर नहीं है देखा..
झूठोँ के तख्त पर बैठे मिलेंगे लोग,
सच केा जो साथ दे , वो लश्कर नहीं है देखा..
चाहें तो कलम की धार से जमाने को मोड दे ,
हिम्मत बढ़ाने वाली, खबरे नहीं है देखा..
संग संग दिए जो चल कंधा लगाने को ,
पड़ने पर वक़्त ज़ालिम , हमसफर नहीं है देखा..
रिश्तों के मेलों में बिके जज्बात सारे अब ,
खुद से मोहब्बत करे जो , कोई रहबर नहीं है देखा..
*शिव* कहता है सुनो अब यार कान खोल के
झांको जो अपने अंदर , दिलबर नहीं है देखा..
डॉ. शिवनाथ सिंह ‘शिव’*
*रायबरेली काव्य रस साहित्य मंच, *




