
झूम-झूम बरसो रे मेघा*
झूम-झूम बरसो रे मेघा!
देख तड़ित सरसो रे मेघा!!
कितना अद्भुत युगल तुम्हारा।
तुम श्यामल वह श्वेत उजारा।।
जब तुम गरज-गरज कर बोले।
चपला अपनी अलके खोले।।
कोपभवन जा बैठी अहमक।
क्रोध शरारे छोड़े भकभक।।
थर्राया था नभ बेचारा।
उसने बादल को फटकारा।।
तब द्युति को भरकर आलिंगन।
करने लगा भूमि का सिंचन।।
शांत दामिनी घर जा बैठी।
भूल गई फिर सकल उलैठी।।
मेघ लौटकर घर जब आया।
दोनों का मुखड़ा मुस्काया।।
स्वरचित
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




