
मुस्कान से महकता आँगन
जिस घर में छोटी बहन हँसती है,
उस घर में सावन रहता है।
सूने आँगन की हर धड़कन में,
उसका ही स्पंदन रहता है।
वह गुड़ियों से सपने बुनती,
सबके दुख को अपना करती।
अपनी इच्छा रोक-रोककर,
सबकी खुशियों पर ही मरती।
भैया की हर राह निहारे,
राखी लेकर द्वार खड़ी।
आँखों में विश्वास सजाए,
मन में प्रेम की ज्योत बड़ी।
बाबुल की वह अंतिम चिड़िया,
ममता का मधुरिम विस्तार।
माँ की बोली, पिता की छाया,
घर का सबसे कोमल संसार।
बेटी होकर जन्मी लेकिन,
सबका साहस बन जाती है।
अपने आँसू पीकर अक्सर,
सबकी हँसी बचा जाती है।
मत आँकना उसको कमज़ोर,
उसमें दुर्गा का भी तेज़ है।
छोटी होकर भी बहना तो,
घर का सबसे ऊँचा सेज है।
जिस दिन बहना दूर चली तो,
आँगन भी वीराना होगा।
दीवारों से पूछोगे तब,
घर किसको घर माना होगा।
आओ आज प्रण हम लें सब,
उसका हर सम्मान करें।
जीते-जी उसके सपनों का,
मिलकर हम उत्थान करें।
‘दिव्य’ कहे मेरी छोटी बहना
ईश्वर का सुंदरतम उपहार है।
जिसके घर मुस्काती बहना,
वही घर सचमुच परिवार है।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




