साहित्य

हम जब भोले से मिलते

कार्तिकेय कुमार

भोले से हम जब-भी मिलते,

मन भर बतियाया करते हैं,

अहं भाव को शब्दकोश में,

किंचित जगह नहीं देते हैं।

भोले से हम ….

जन्म लिया था जब धरती पर,

क्या कुछ लेकर आए थे ?

बंधी हुई थी तब ये मुट्ठी,

खाली हाथ अब जाओगे।

भोले से हम …

धन,पद,मोह भरा ये जीवन,

अंधियारा लेकर आएगा,

कर्मों की जो राह सुधारी,

तो जीवन पा जाएगा।

भोले से हम ….

जब तक इच्छाओं की गंगा,

मन में तेरे बहा करेगी,

धुंध का छाया जो ये कोहरा,

कभी नहीं छट पाएगा।

भोले से हम ….

पशुपति के रूप को पढ़कर,

भाव सभी बखान रहे,

जो-जो बीता जैसे बीता,

बस भोले का भान रहे।

भोले से हम ….

नमन करो पावन भूमि को,

जहां भोले नें चरण धरे,

मन पावन कर ध्यान धरोगे,

पास पाओ भोले को खड़े।

भोले से हम ….

( 275/333 वां मनका)

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कार्तिकेय कुमार त्रिपाठी ‘राम’

गांधीनगर, इन्दौर,(म.प्र.)

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