
ये बूढ़े लोग लाचार नहीं जीवन का सम्मान होते हैं
इनके चरणों में ही तो घरआँगन के भगवान होते हैं।
जिन कंधों पर बैठ दुनिया का पहला मेला देखा था,
आज उन्हीं कंधों को बेटे बोझ समझने लगे हैं!
जिन हाथों ने रोटी सेंकी खुद भूखे रहकर पाला था
वृद्धाश्रम की चौखट पर क्यों उनका भाग्य संभाला था
दौलत शोहरत ऊँचे महल सब यहीं रह जाएँगे
माँ-बाप के आँसू बनकर कर्म तुम्हें तड़पाएँगे।
मत तोड़ो उनके सपनों को मत दिल उनका तोड़ो तुम
जीवन भर जो साथ रहे उनका हाथ न छोड़ो तुम।
बूढ़े पेड़ों की छाया ही तपती धूप बचाती है
माँ-बाप की सच्ची दुआ हर मुश्किल हर जाती है।
जिस दिन उनकी आँखें बंद फिर पुकार न सुन पाओगे,
रो-रोकर लाख पुकारोगे फिर उनको न बुला पाओगे।
आओ मिलकर प्रण ये लें उनका मान बढ़ाएँगे
जीते-जी माँ-बाप की सेवा कर जीवन सफल बनाएँगे।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश
मौलिक अप्रकाशित रचना




