बता दो न गुरुवर,
किस राह हम जाए।
सुलझ जाए जीवन ,
वो चरण कैसे पाए।
अज्ञानता की मुझमें,
है नहीं कोई भी सीमा।
मन बवंडरों से मुक्ति ,
प्रभु किस भांति हम पाए।
कैसे मिलेगा मुझको,
पथ और प्रकाश प्रभुवर।
मन शक्ति और साधना ,
कैसे हम प्रभु जी पाए।
धारण किया मै को,
करता रहा प्रभु निरादर।
पापों की गठरिया को हम,
कैसे सर से उतार पाए।
तूने नहीं था छोड़ा,
हमने ही भुलाया तुमको।
अब दे दो न सहारा,
भूले से न भूल पाए।
मीना तिवारी
पुणे




