साहित्य

गुरु पूजन भारतीय परंपरा

डॉ मंजु गुप्ता

आषाढ़ माह की पूर्णिमा को व्यास पूजा का दिवस होता है। इसी को गुरु पूर्णिमा भी कहते हैं । आज तकनीकी युग में आधुनिकता , पाश्चात्य संस्कृति के दौर में भारतीय संस्कृति, , तीज त्यौहार , परंपराओं का हनन हुआ । इसी संदर्भ में गुरु पूर्णिमा का पर्व का उत्सव मनाने का उत्साह भी हमें समाज में कम दिखायी देता है। क्योंकि आज गुरु का रूप हमें कई रूपों में दिखायी देता है ।

छात्र स्कूलों , कॉलिज , विश्विद्यालय में विद्यार्जन करने लिए जाते हैं । हर विषय के अलग -अलग गुरु होते हैं । छात्र परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए ट्यूशन भी लगाने होते हैं तो वह किस – किस गुरु ट्यूशन लगाएगा , किस गुरु को पूजेगा ।

डिजिटल युग में गूगल बाबा , ए आई ने गुरुओं का महत्त्व को नकार दिया। हाथों में मोबाइल रहता है। उन्हें अपने प्रश्नों का समाधान तुरन्त मिल जाता है। लेकिन वह आसानी से समझ नहीं पाता है। इसके लिए अज्ञान के अंधकार को दूर करने , चरित्र निर्माण , बौद्धिक , मानसिक , नैतिक विकास के लिए , सही , गलत का ज्ञान देने वाले ल गुरु का होना आवश्यक है। इसलिये विद्यालयों और महाविद्यालयों में गुरू पूर्णिमा का पर्व उत्सव के रूप में मनाना आवश्यक हो । जिससे विद्यार्थी गुरु के महत्व को समझे और गुरु भी वर्तमान परिस्थित को ध्यान में रखते हुए विद्यार्थियों का मार्ग दर्शन कर सके । यह स्थायी परम्परा बने।

गुरु अपने ज्ञान आलोक , अनुभव से कच्ची मिट्टी के अबोध साँचों को अंदर – बाहर से सँवार देता है । गुरु में गु का अर्थ है अन्धकार और रु का अर्थ प्रकाश यानी गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जानेवाला मार्गदर्शक होता है।शिष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। 1गुरु की अमृत तुल्य दृष्टि पड़ते ही छात्रों के मन की मलिनता दूर हो जाती है। ऐसे में गुरु का पुजन करना भारतीय परंपरा है। सांदीपनि के शिष्य प्रभु श्री कृष्ण , विप्र सुदामा थे। गुरु विश्वामित्र की सेवा से प्रभु राम , लक्षमण ने कभी जी नहीं चुराया। इनकी गुरुभक्ति धन्य है, आज की पीढ़ी के लिए मिसाल है।

गुरु ही गुरु और गोविंद में भेद करना बताता है। गुरु ही छात्रों का जीवन सत्यम शिवम सुंदरम बनाता है। और उसे प्रभु चरणों में ले जानेवाला गुरु होता है।

गुरु लोहे को सोना बनानेवाला पारसमणि होता है मतलब यह कि शिष्यों को गुर गुरुत्व देकर अपनी प्रतिमूर्ति बना देता है।

ऐसे श्रद्धाभाव गुरु के प्रति होने चाहिए , हमें स्कूलों में महाविद्यालय में सदगुरुओं को पूजा करनी चाहिए। अंत में

मुक्तक में गुरु के गुरुत्व धार के लिए मैं कहती हूँ –

मात -पिता गुरुओं के ज्ञानाधार से,

 

विद्या , शिक्षा अरु मूल्य आचार से,

 

थी उखाड़ दी सत्ता कृष्ण , चंद्र ने,

संदिपनी , चाणक्य गुरु की धार से ।-डॉ मंजु गुप्ता

 

गुरु हमें विद्या देता है विद्या हमें विनय सिखाती है।

*विद्या ददाति विनयम्*-सादर!

 

*श्रद्धावान लभते ज्ञानम्!*

 

– डॉ मंजु गुप्ता

 

वाशी , नवी मुंबई

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