
कारगिल के प्रांगण में, भीषण युद्ध हुआ रण में।
भारत माँ का हितकारी था वो अटल विहारी था। ।
पाकिस्तान मुशर्रफ दिवाना कश्मीर को हथियाना।
दुश्मन ने सरहद पार किया पर्वत पर अधिकार पाना।
भारत को जब खबर मिली दिल्ली से फरमान मिला।
मार भगाओ एक एक को खून पिला दो रण चंडी को।
दुश्मन ऊंची चोटी पर डेरा डाले ऊंचे पर्वत पर टोली।
धीरे धीरे सैनिक टोली चढ़ते खा रहे थे सीने परगोली।
तोपों के लेके आगे बढ़ती उनकी सांस उखड़ती थी।
हार तभी न मानी थी शोणित दुष्ट का बहा कर पानी।
नीचे से दाग रहे थे गोले पर्वत के पथ हमने खोले।
भारत माँ का जयगान किया दुश्मन के होश उड़ाते थे।
लाल- लाल हो रही थी माटी दहल उठी थी तब घाटी।
तब युद्ध का अंत हुआ घाटी जयकारों से गुंजित हुई।
डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश



