साहित्य

बंदिश  

राजीव त्रिपाठी

बंदीशे कितनी सही

मगर इससे ज़्यादा और नहीं!!

जागती है रूह तो इन्सान जागता है

दूसरा मौक़ा ज़िन्दगी देती नहीं!!

लोग बुराई में अच्छाई तलाश रहे हैं

जैसे उनसे अच्छा जहांँ में कोई नहीं!!

सभी मतलब की रिश्तेदारी है

असल में कोई सगा है ही नहीं!!

समेट रखी थी ख़ुशी किसी मक़्सद से

मगर वह इस बात पर हंँसा ही नहीं!!

इन्सान की फ़ितरत है बदल जाना

जैसे कोई दूसरा इन्सान बचा ही नहीं!!

लोग बड़े ख़ुदगर्ज़ है आजकल

काम निकल जाए तो पहचानते नहीं!!

उनके घर पर ना जाने किसने दस्तक दी

मुद्दत से तो यहांँ कोई रहा ही नहीं!!

सारे लोग एहसान फ़रामोश निकले

एक भी आदमी का सारा कुसूर नहीं

ना जाने क्यों रूठ कर चला गया मुझसे

मैंने तो उसके बारे में कुछ कहा ही नहीं!!

 

स्वरचित- राजीव त्रिपाठी

उदयपुर राजस्थान

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