
पिंजरा छूटा पंछी भागा,
नया सफर अब आगे होगा।
कच्चा धागा काया टूटी,
किसने किसको कब है रोका?
सामने आए श्याम सलोने,
या फिर दिखे दूत डरावने?
कर्मों का बस्ता है भारी,
किस विध पाओगे तुम बचने?
बोले तब यमराज धर्मी,
सुन ले प्यारे ओ मुसाफिर।
झूठ यहाँ पर चलता नाहीं,
सच्चा है बस कर्म आखिर।
खोल किताब चित्रगुप्त ने,
पाप-पुण्य सब बांच सुनाए।
रोई आत्मा थर-थर कांपे,
राह न कोई नजर को आए।
धन और वैभव यहीं रहे हैं,
साथ न आए एक भी तिनका।
जैसा बोया वैसा काटा,
कर्म ही तेरा सच्चा सिक्का।
स्वरचित
संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश




