साहित्य

आनलाइन साड़ी का सपना

जयचन्द प्रजापति

आनलाइन मिलने वाली साड़ी की तस्वीर देखकर हरिमोहन की पत्नी का हृदय गदगद हो गया। मन मयूर हो उठा। कितनी खूबसूरत साड़ी। गुलाबी साड़ी में लड़की की तस्वीर सुंदर राजकुमारी से कम नहीं। पीली साड़ी में लगी लड़की की तस्वीर किसी फिल्म की नायिका की तरह लग रही है। ऐसी साड़ी मै पहन लूंगी तो सारी दुनिया मेरी सुंदरता के सामने नतमस्तक हो जायेगी।

 

ऐसी कल्पना करके हरिमोहन की पत्नी ने एक गुलाबी साड़ी का आनलाइन आर्डर कर दिया। आनलाइन आर्डर होते ही बेचारी दर्पण के सामने बैठकर एक हल्की मुस्कान ली। आज उसके सभी सपनों में से एक सपना था। वह सपना आनलाइन मंगाई साड़ी पहनकर मायके जाने का है। दर्पण में तरह-तरह का चेहरा बनाकर खुशी से ऐसे झूम रही है जैसे सावन के महीने में लड़कियां हरी-हरी साड़ी पहनकर झूला झूल रही हैं। इस झूले पर कई सहेलियाँ बैठी हैं और मस्ती में कजरी गीत गा-गाकर मदहोश और आनन्दित हो रही हैं।

 

आज साड़ी आने का मैसेज पढ़ कर बेचारी की खुशी दुगुनी हो गयी। जिस चित्र को देखकर साड़ी मंगाई थी। वह तस्वीर देखकर रही है। कितनी खूबसूरत लग रही है यह तस्वीर। कितनी अच्छी साड़ी है। कितना मुझ पर अच्छा लगेगा। मेरे पति महोदय मुझे इस साड़ी में देखकर मंत्रमुग्ध हो जायेंगे।

 

आखिर वह सुनहरा मौका आ ही गया। आनलाइन साड़ी आ गयी। जल्दी से डिब्बा खोला। एक गुलाबी कलर की साड़ी जैसे पुरानी साड़ी को प्रेस करके डिब्बे में पैक कर रख दिया गया हो। साड़ी में कोई रौनक नहीं, जो उस साड़ी को पहन ले, उसके सौंदर्य में चार चांद तो नहीं लगेगा बल्कि एक बुजुर्ग महिला की तरह महसूस होने लगेगा।

 

साड़ी को वापस कर दिया गया। इस प्रकार पुन: लाल रंग की साड़ी का आर्डर किया गया। सपना बेचारी बनाकर फिर बैठी रही। साड़ी में खूबसूरत दिखने का सपना था। फिर आयी साड़ी। वही पुरानी रौनक में। साड़ी वापस करके आर्डर कैंसिल कर दिया गया। आनलाइन आर्डर पुन: न करने का फैसला लिया गया। आनलाइन साड़ी ने सपनों को तोड़कर रख दिया।

 

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जयचन्द प्रजापति  ‘जय’

प्रयागराज

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