
सावन का मौसम आया है,
फ्रेंडशिप का दिन भी लाया है।
खुशियों के दीप जलाने हैं,
मिलने के बहाने बनाने हैं।
दूरियाँ सारी मिटानी हैं,
दिल की बातें सुनानी हैं।
हँसते-हँसते गले लग जाना,
फ्रेंडशिप बैंड फिर बाँध आना।
थोड़ी खुशियाँ चुरा लाते हैं,
कुछ सुनहरे पल सजाते हैं।
सखियों संग बेफिक्र हँसना है,
बचपन फिर से आज जीना है।
सावन का प्यारा मौसम आया,
मन ने फिर संदेशा भिजवाया।
पूछो ज़रा प्रीति, सपना, किरण से—
कब होगा अपना मिलन हँसी से?
चलो टिकट अब जल्दी कराते हैं,
सपनों की राह निकल जाते हैं।
गाड़ी में बैठ कहीं दूर चलें,
फिर अपने बचपन से जा मिलें।
चौराहे की चटपटी चाट खाएँ,
तीखी-मीठी पानी-पूरी उड़ाएँ।
हँसी के मोती बिखराएँ ऐसे,
याद रहें ये पल बरसों जैसे।
चलो पुराने स्कूल भी जाएँ,
अपनी यादों को फिर सहलाएँ।
जिन गुरुओं ने राह दिखाई,
उनको श्रद्धा से शीश झुकाएँ।
अपनी प्यारी उस कक्षा में,
कुछ पल फिर खो जाएँ हम।
जहाँ कभी झंडा लहराता था,
वहीं तिरंगे को नमन करें हम।
सावन का मौसम मुस्काता है,
दोस्ती का संदेश सुनाता है।
सखियों का संग सबसे प्यारा,
यही तो जीवन का है सितारा।
– कवयित्री ज्योति बरनवाल
नवादा (बिहार)




