साहित्य

दर्पण दोहा

 किरण कुमारी

दर्पण खोले भेद सब, है यह सबको ज्ञात।

जैसा दिखता है भला, कहता सच्ची बात।।

 

दर्पण के आगे सदा, हार गया है झूठ।

कड़वी सच्ची बात सुन , झूठे जाते रूठ।।

 

ढलती जाती उम्र की, दर्पण बना गवाह।

झुर्री को गिनता रहा, करता रहा अगाह।।

 

दर्पण से कब कुछ छुपा ,किसी सदी में मित्र ।

सबको भाये इसलिए, बदले नहीं चरित्र ।।

 

दर्पण अपने आप में, अलग रखे पहचान।

हाल इसी से पूछते, जग में ऊँचा स्थान।।

 

दर्पण सम बनना भला ,किसके मन की चाह।

चाह रखे ज्यों एक मन, जगत बदल दे राह।।

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