
कई सदियों की सही गुलामी,
फिर भी हमको समझ न आया।
हाल हमारे जस के तस हैं,
आजादी पाकर क्या पाया।।
ऊँच – नीच में बंटे हुए हम,
सुधर न पाया ताना – बाना।
छुआ-छूत और भेदभाव का,
रहा आज भी वही जमाना।।
सत्ता लोलुप नेताओं ने,
सही रास्ता नहीं दिखाया।
हाल हमारे जस के तस हैं,
आजादी पाकर क्या पाया।।
अगड़े – पिछड़े दीन- हीन को,
नहीं पूछने वाला कोई।
संविधान का करें दिखावा,
आज वतन की इज्जत खोई।।
लड़ते हैं श्वानों के जैसे,
इक दूजे का हक खा जाते।
लूट – लूट कर भरें खजाना,
सत्ता पाकर वो इतराते।।
भ्रष्टाचार का जहर यहाँ पर,
नस – नस में है आज समाया।
हाल हमारे जस के तस हैं,
आजादी पाकर क्या पाया।।
न्यायालय में न्याय बिक रहा,
अंधा बहरा है यहाँ शासन।
लूट रहा इज्जत अबला की,
चौराहे पर आज दुशासन।।
युगों युगों से दीन हीन सा,
रोता यहाँ दलित बेचारा।
आरक्षण की भेंट चढ़ गया,
आज यहाँ पर भाईचारा।।
अर्थ रहा ना लोकतंत्र का,
भीड़ तन्त्र का युग है आया।
हाल हमारे जस के तस हैं,
आजादी पाकर क्या पाया।।
आम आदमी फंसा कर्ज में,
नेता खाते रोज मलाई।
बेटे पोतों की चिंता बस,
करता है अब कौन भलाई।।
भाई है भाई का चारा,
इक दूजे पर घात लगाते।
मतलब हो जाये गर पूरा,
भाई को ही लात लगाते।।
नेह रहा ना सम्बन्धों में,
आज समय ये कैसा आया।
हाल हमारे जस के तस हैं,
आजादी पाकर क्या पाया।।
——- सुभाष चन्द्र शर्मा
मुरलीपुरा, जयपुर
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