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प्रकृति नटी नवयौवना,पल-पल बदले रूप।
कभी शिशिर,हेमंत हैं,कभी ग्रीष्म की धूप।।
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शीत वेग बढ़ने लगा , निकले स्वेटर शाल।
माँ पापड़ी जमा रही,गुड़ में तिल को डाल।।
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सुबह शाम कुहरा बढ़ा,वाहन चलते मंद।
सूझ न पाती राह है , मारग लगते बंद।।
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ओस विन्दु फैले हुए ,हरी-भरी है घास।
किरणों से होगा हमें,मोती सा आभास।।
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ठंडक जब बढ़ने लगे, ऐसा करो उपाय।
हल्दी वाला दूध लो ,चार बार लो चाय।।
* आशा बिसारिया चंदौसी



