साहित्य

एक गज़ल

मंजुला शरण 'मनु '

जरूरत है सभी को कौन कितना बांट पाएगा
किया खुद का भरोसा ही हमेशा काम आएगा।

समय की धार है जीवन लहर का खेल ही ठहरा
जिसे तूफां डरा दे वो कभी क्या जीत पाएगा ।

रहे आज़ाद हर बुलबुल चमन ये चाहता तो है
मगर सैयाद से उनको कहाँ तक ही बचाएगा।

दिवारें हो गयीं ऊँची उधर तुम हो इधर हम हैं
शिनायत हो चुके काग़ज कहाँ फिर खुद बताएगा।

नसीहत चीज़ ऐसी है मिला करती बिना माँगें
अगर गिर जाए कोई तो क्या उसको उठाएगा।

मंजुला शरण ‘मनु ‘
राँची, झारखण्ड़।

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